कोरोना वायरस पर नई चिंता, दस राज्यों के 67 फीसदी मरीजों में नहीं दिखे लक्षण

0
21

नई दिल्ली                                                                                
भारत में कोरोना के एसिम्पटोमैटिक मरीजों की बढ़ती संख्या से प्रशासन की चिंताएं बढ़ गई हैं। देश के दस प्रमुख राज्यों में अब तक मिले कुल संक्रमितों में से औसतन 67 फीसदी ऐसे हैं, जिनकी कोरोना जांच की रिपोर्ट तो पॉजिटिव आई, लेकिन उनमें वायरस के कोई लक्षण नहीं थे। विशेषज्ञों का कहना है कि वायरस के ये छिपे वाहक अनजाने में बड़े पैमाने पर अपने संपर्क में आने वाले लोगों में संक्रमण फैला रहे हैं। इसलिए रैपिड या पूल जांच के जरिए इनकी पहचान करना और आइसोलेशन में भेजना बेहद जरूरी है।

'हिन्दुस्तान टाइम्स' के एक विश्लेषण से पता चला है कि महाराष्ट्र में शनिवार तक सामने आए कुल 3,648 मरीजों में से 65 फीसदी एसिम्पटोमैटिक थे। वहीं, उत्तर प्रदेश में 974 में से 75 फीसदी, जबकि असम में 34 में से 82 प्रतिशत मामलों में संक्रमित जांच के समय सर्दी, जुकाम, बुखार या सांस लेने में तकलीफ जैसी शिकायतों से नहीं जूझ रहा था। बड़ी संख्या में मरीजों में उपचार के दौरान भी लक्षण नहीं उभरे।

उधर, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने रविवार को कहा था कि एक दिन पहले जिन 186 लोगों में कोरोना की पुष्टि हुई है, उनमें से किसी में भी संक्रमण के लक्षण नहीं थे। हरियाणा में कोविड-19 निरोधी अभियान के नोडल अधिकारी डॉ. सूरज भान कंबोज ने भी राज्य में मिले ज्यादा संक्रमितों के एसिम्पटोमैटिक होने का खुलासा किया है। हालांकि, जानकारों का मानना है कि बिना लक्षण वाले मरीजों में बड़ी संख्या में प्री-सिम्पटोमैटिक मरीज भी शामिल हो सकते हैं। ये वे मरीज हैं, जिनकी जांच लक्षण पनपने से पहले ही कर ली गई थी।

इसलिए नहीं दिखते वायरस के लक्षण : स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मानें तो कोरोना से संक्रमित मरीज की उम्र, प्रतिरोधक क्षमता और वायरल लोड (खून में वायरस की संख्या) तय करता है कि उसमें वायरस के लक्षण दिखाई देंगे या नहीं। अगर मरीज की रोग-प्रतिरोधक क्षमता मजबूत है और उसका वायरल लोड भी कम है तो संभव है कि जांच होने तक पता ही न चल पाए कि संबंधित शख्स कोरोना का शिकार है।

कम उम्र के एसिम्पटोमैटिक मरीज ज्यादा : बेंगलुरु स्थित राजीव गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ चेस्ट डिजीजेज के निदेशक डॉ. सी नागराज कहते हैं, ज्यादातर एसिम्पटोमैटिक मरीजों की उम्र 20 से 45 साल के बीच है। कम उम्र में प्रतिरोधक कोशिकाओं की अधिक मौजूदगी उनमें लक्षण नहीं उभरने की मुख्य वजह हो सकती है। यही नहीं, प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली दवाएं लेने वाले बुजुर्गों में भी शुरुआती स्तर में लक्षण नहीं दिखते।

विदेश में भी हो रहा इजाफा : चीन में कोरोना के दोबारा सिर उठाने के पीछे एसिम्पटोमैटिक मरीजों का हाथ माना जा रहा है।

वहीं, देश में फिलहाल बिना लक्षण वाले 43 हजार से अधिक मरीजों की पहचान कर उन्हें पृथक किया जा चुका है। वहीं, कोरोना संक्रमण पर बहुत हद तक काबू पा लेने का दावा करने वाले दक्षिण कोरिया में भी लगभग 30 हजार एसिम्पटोमैटिक संक्रमितों को अलग-थलग किया जा चुका है।

क्रिटिकल: यह सबसे खराब स्थिति होती है। ऑक्सीजन न मिलने से शरीर के अंग एक-एक कर काम करना बंद करने लगते हैं। मरीज को सबसे ज्यादा जीवन रक्षक उपकरणों की जरूरत होती है। यह हालात तभी आती है जब शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र बेहद कमजोर होता है या कोई गंभीर बीमारी उन्हें हुई हो।
 
मॉडरेट: जब मरीज माइल्ड से बदतर स्थिति में चला जाता है तो उसे मॉडरेट श्रेणी में रखा जाता है। इसमें फेफड़ों में सूजन, तेज बुखार और खांसी आने लगती है। फेफड़ों में तरल पदार्थ जमा हो जाता है जिससे सोते समय भी परेशानी महसूस होती है। ज्यादातर पुष्टि वाले में मामलों में ऐसे लक्षण नजर आने लगते हैं।

सीवियर: इसमें मरीज निमोनिया से पीड़ित हो जाता है और सांसें फूलने लगती है। यहां तक कि प्रति मिनट 30 या उससे ज्यादा बार सांस लेने की नौबत आ जाती है। शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा कम होने लगती है। सीना, पेट और पीठ की ओर काफी तेज दर्द होता है। पेट काफी सख्त हो जाता है और खाने-पीने में मुश्किल महसूस होती है।