जानिए, कब है भडल्या नवमी और क्या है इसका महत्व

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आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष की नवमी को भड़ली या भडल्या नवमी कहते हैं। इसी दिन गुप्त नवरात्रि का समापन भी होता है। उत्तर भारत में इस तिथि को विवाह के लिए अबूझ मुहूर्त माना जाता है। हिंदू धर्म में विवाह के लिए कुछ अबूझ मुहूर्त बताए गए हैं। भड़ली नवमी उन्हीं में से एक होती है। इस वर्ष भड़ली नवमी 10 जुलाई बुधवार को पड़ रही है। इसके ठीक दो दिन बाद 12 जुलाई को देवशयनी एकादशी का पर्व है। कम लोग ही इस तिथि की महत्ता के बारे में जानते हैं, तो चलिए हम आपको बताते हैं कि क्या है भडल्या नवमी और क्या है इसका महत्व। इसके अलावा क्या होते हैं अबूझ मुहूर्त और क्यों माने जाते हैं खास, इस बारे में भी बताएंगे।

अबूझ मुहूर्त क्या है

अबूझ सावे तिथि का अर्थ है कि जिन लोगों के विवाह के लिए कोई मुहूर्त नहीं निकलता उनका विवाह इस दिन किया जाए तो उनके वैवाहिक जीवन में किसी प्रकार का व्यवधान नहीं आता है। कहने का अर्थ है कि बिना किसी चिंता के इन विशेष तिथियों पर मांगलिक कार्य समपन्न किए जाते हैं। यह तिथियां ऐसी होती हैं कि इन पर बिना पंडित की सलाह लिए शुभ काम किए जाते हैं। साथ ही इनमें पंचांग को देखने की जरूरत नहीं होती है। बिना ज्योतिष को दिखाए ही मांगलिक कार्य किए जाते हैं। ये दिन स्वयं में इतने सिद्ध होते हैं और यह अति शुभ दिन माने जाते हैं।

 

कब-कब पड़ते हैं अबूझ सावे

हिंदू कैलेंडर के अनुसार, एक वर्ष में निम्न अबूझ मुहूर्त होते हैं।

बसंत पंचमी, फुलेरदोज (फाल्गुन पक्ष की शुक्ल पक्ष की द्वितीया), रामनवमी, जानकी नवमी, पीपल पूर्णिमा (वैशाख मास की पूर्णिमा), गंगा दशमी (ज्येष्ठ मास की शुक्ल दशमी) भडल्या नवमी (आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की नवमी)।

दो दिन बाद सो जाते हैं देवी-देवता
भड़ली नवमी के दो दिन बाद देवशयनी एकादशी से चातुर्मास लग जाता है, जिसका अर्थ होता है कि भड़ली नवमी के बाद 4 माह तक विवाह या अन्य शुभ-मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस अवधि में सभी देवी-देवता निद्रा में चले जाते। इसके बाद सीधे देवउठनी एकादशी पर नारायण भगवान (विष्णुजी) के जागने पर चातुर्मास समाप्त होता है और फिर सभी तरह के शुभ कार्य शुरू किए जाते हैं।