दूसरों का सहारा बनकर मिसाल पेश कर रहे ये एड्स पीड़ित

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 नई दिल्ली
 एचआईवी पॉजीटिव यानी एड्स से पीड़ित होने का मतलब जिंदगी का खत्म होना नहीं है। समाज भले ही ऐसा मानकर एचआईवी संक्रमित लोगों को हाशिये पर धकेलने की कोशिश करता हो मगर हौसले के जरिये कुछ एड्स पीड़ित न केवल अपनी जिंदगी में बदलाव लाने में कामयाब हुए बल्कि परिवार और दूसरों का सहारा बनने का काम कर रहे हैं।

गोरखपुर : बीमारी ने पति छीना और खुद भी संक्रमित मगर परिवार पाल रहीं
महज आठवीं तक पढ़ी उमा (काल्पनिक नाम) को शादी के तीन साल बाद पता चला कि उनके पति एचआईवी संक्रमित हैं। जांच में वह खुद भी एचआईवी संक्रमित निकलीं लेकिन हिम्मत नहीं हारी। उमा को गर्भ में पल रहे संतान की चिंता हुई। दोनों इलाज कराने के लिए बीआरडी मेडिकल कालेज के एआरटी (एंटी रेट्रो वायरल थेरेपी) सेंटर पहुंचे और उनका बच्चा इस बीमारी से बच गया।

दक्षिण अफ्रीका में तकनीशियन की नौकरी करने वाले उनके पति की नौकरी छूट गई। आर्थिक तंगी के बीच बेटे के जन्म के कुछ दिन बाद 2014 में ही उनकी मौत हो गई। संयुक्त परिवार को चलाने के लिए उमा ने एक गैर सरकारी संस्थान में चतुर्थ श्रेणी की। बीमारी से जूझने के साथ इंटर पास किया। आज वह अपने बच्चे के साथ ही सास, ससुर, विधवा जेठानी और उनकी बेटी का सहारा हैं। उमा एचआईवी पीड़ितों की काउंसिलिंग का काम भी करती हैं।

मुजफ्फरपुर : आठ हजार लोगों का सहारा हैं देवेश
खुद एचआईवी से लड़ते हुए देवेश (काल्पनिक नाम) मुजफ्फरपुर के एसकेएमसीएच में एआरटी ले रहे (एंटी रेट्रोवायरल थैरेपी) सैकड़ों मरीजों के लिए न केवल रोड मॉडल हैं। देवेश एसकेएमसीएच से जुड़े आठ हजार मरीजों के इलाज में आर्थिक संबल बन चुके हैं। उन्होंने मुजफ्फरपुर समेत उत्तर बिहार में एक नेटवर्क बनाया है। इस नेटवर्क का संचालन खुद करते हैं। वह सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों की मदद तीन हजार एचआईवी पॉजिटिव पुरुष-महिलाओं को प्रति माह 15-15 सौ रुपये और इनके नाबालिग (18 साल से कम उम्र) बच्चों को प्रति एक संतान एक हजार रुपये दिलवा रहे हैं।

एसकेएमसीएच मुजफ्फरपुर के अधीक्षक डॉ. एसके शाही ने बताया कि देवेश ने खुद कभी मानसिक संबल नहीं खोया और दूसरे मरीजों के लिए भी वह मजबूती की मिसाल हैं। वे मरीजों का डाटा रखते हैं और बराबर उनका फॉलोअप करते हैं। वे एचआईवी संक्रमित लोगों के घर वालों से भी मिलते हैं।

जमशेदपुर : संघर्ष कर नौकरी वापस पाई
पूर्वी सिंहभूम जिले के एचआईवी पीड़ित 52 वर्षीय शंभू (काल्पनिक नाम) के 2010 में एचआईवी पीड़ित होने का पता चलते ही कंपनी ने उसे नौकरी से निकाल दिया। परिवार के समक्ष भुखमरी की स्थिति आ गई मगर उन्होंने हार नहीं मानी। शंभू ने नेटवर्क फॉर पीपल लिविंग विद एचआईवी-एड्स की मदद से कंपनी प्रबंधन से बात की। कंपनी प्रबंधन ने एक न सुनी।

अंततः शंभू ने कंपनी प्रबंधन के खिलाफ कोर्ट में केस कर दिया। कोर्ट की ओर से वर्ष 2012 में कंपनी प्रबंधन को आदेश दिया गया कि वह विशेष मेडिकल सुविधाओं के साथ शंभू को वापस नौकरी पर रखे। कंपनी प्रबंधन को शंभू को नौकरी पर वापस रखना पड़ा। शंभू आज नौकरी के साथ अपने दो बच्चों को बेहतर शिक्षा दे पा रहे हैं।

रांची : अपनी परेशानी भूल दूसरों की मदद में उतरे
हजारीबाग के सुजीत दुबे (बदला हुआ नाम) को वर्ष 2000 में एचआईवी पॉजिटिव होने का पता चला। दिल्ली में सरकारी नौकरी से वीआरएस लेकर वह हजारीबाग आ गए और जहां से हर माह उन्हें जेजे अस्पताल मुंबई दवा लेने जाना पड़ता था। वर्ष 2004 में हजारीबाग में ही एक निजी अस्पताल की सिस्टर ब्रिटा की काउंसलिंग ने उनकी जिंदगी बदल दी। फिर झारखंड एड्स कंट्रोल सोसायटी की मदद से उन्होंने नेटवर्क बनाया और दो बच्चों के साथ अकेले जिंदगी गुजार रही एक विधवा से उन्होंने शादी कर ली। सुजीत अब समाज में तिरस्कृत दूसरे एचआईवी पीड़ितों का घर बसाने में जुट गए हैं।

धनबाद : आत्महत्या का ख्याल दूसरों का सहारा बने मोहन
धनबाद के मोहन (काल्पनिक नाम) को अक्टूबर 2009 में 16 साल की उम्र में एचआईवी पॉजिटिव होने का पता चला। मन में कई बार आत्महत्या का ख्याल आया। मगर समाज और पीड़ितों नेटवर्क के साथियों ने उनकी मदद की। मोहन ने फिर नवंबर 2013 में एचआईवी संक्रमित लड़की से शादी की। बराबर दवा लेने के कारण उनके घर संक्रमण मुक्त संतान हुई। मोहन आज खुद नौकरी के साथ एचआईवी पीड़ितों के लिए काम कर रहे हैं।

महाराजगंज : खून चढ़ाने से इन्कार पर आंदोलन छेड़ा
परतावल क्षेत्र के सुरजीत (बदला नाम) को वर्ष 2003-04 से एचआईवी पीड़ित होने का पता चला। इलाज के दौरान ही सरकारी अस्पतालों ने जब एचआईवी संक्रमित मरीजों को खून चढ़ाने से मना किया तो उन्होंने मुहिम छेड़ दी। उन्होंने एचआईवी पीड़ितों का समूह बनाया। वह पीड़ितों को सरकारी अस्पतालों में नि:शुल्क खून उपलब्ध करवाने में मदद करते हैं। उनके सेवाभाव और काम को देख एक सरकारी संस्था ने उसे प्रदेश स्तर पर अधिकारी नियुक्त किया है। अब वह नाल्को के काउंसलर्स को ट्रेनिंग दे रहा है। उन्होंने एचआईवी से ग्रसित युवती के साथ शादी की और अब इस दम्पति के एक स्वस्थ्य बच्चा भी है।