प्रेग्नेंसी संशोधन बिल पांच साल बाद भी पेश नहीं, केंद्र ने साधी चुप्पी

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नई दिल्ली
 
रेप की शिकार महिलाओं को गर्भपात के लिए वर्तमान समयसीमा को 20 सप्ताह से बढ़ाकर 24 सप्ताह करने वाले और विकारता के मामले में गर्भपात की समयसीमा को समाप्त करने वाले मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (संशोधन) विधेयक का ड्राफ्ट तैयार हुए पांच साल हो चुके हैं। बावजूद केंद्र सरकार अब तक इस बिल को संसद में पेश नहीं कर सकी है। इस दौरान तकरीबन 70 महिलाओं को गर्भपात कराने के लिए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का सहारा लेना पड़ा है।

खास बात ये है कि वर्तमान बजट सत्र में भी सरकार ने ये माना है कि विधेयक तैयार है। हालांकि वह यह बताने को तैयार नहीं है कि यह बिल कब तक पेश किया जाएगा। विशेष परिस्थितियों में गर्भपात की समयसीमा बढ़ाने के लिए वर्ष 2006 में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने विभिन्न मंत्रालयों, राज्य सरकारों, डॉक्टरों, गैर-सरकारी संगठनों से विचार-विमर्श शुरू किया था। सभी पक्षों से बातचीत के बाद 2014 में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (संशोधन) बिल का ड्राफ्ट तैयार किया गया था।

इस पर लोगों से सुझाव आमंत्रित किए और इन सुझावों के आधार पर नया मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगेनेंसी (संशोधन) बिल 2016 तैयार किया गया। हालांकि, ये विधेयक भी संसद का मुंह नहीं देख सका। इधर, 2016 के बाद से 70 महिलाओं को 20 सप्ताह के गर्भावस्था के बाद गर्भपात के लिए देश की शीर्ष अदालतों का रुख करना पड़ गया। इनमें ज्यादातर मामलों में गर्भस्थ शिशु में गंभीर विकार था, वहीं कुछ मामले दुष्कर्म पीड़ित महिलाओं की ओर से दायर किए गए थे। इसमें से एक दुष्कर्म पीड़ित नाबालिग का मामला खासा चर्चा में रहा था। कुछ मामलों को छोड़ ज्यादातर मामलों में कोर्ट ने गर्भपात की अनुमति दे दी थी।

अब हाल ही में एक सवाल के जवाब में स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने कहा कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (संशोधन) बिल 2019 ड्राफ्ट कर लिया गया है। इस पर विभिन्न हितधारकों से चर्चा की जा रही है। यानी जो काम 2014 और 2016 में दो बार किया जा चुका है, उसे एक बार फिर से किया जा रहा है।

70 महिलाओं को गर्भ गिराने के लिए लेनी पड़ी कोर्ट से अनुमति पिछले तीन साल में।
वर्तमान सत्र में भी केंद्र ने दोहराया कि ड्राफ्ट तैयार, लेकिन कब पेश होगा इस पर साधी चुप्पी।

ये संशोधन हैं प्रस्तावित
* रेप पीड़िता, पारिवारिक व्यभिचार पीड़िता, एकल महिला (अविवाहित, तलाकशुदा और विधवा) और विकलांग महिलाओं को भी मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी के दायरे में लाना।
* गंभीर मामलों में गर्भपात के लिए गर्भावधि की अधिकतम सीमा को 20 सप्ताह से बढ़ाकर 24 सप्ताह करना।